India’s 90th Grandmaster Ilamparthi AR Who Travelled Alone at 16 to Chase Chess Glory: भारत के 90वें ग्रैंडमास्टर 16 वर्षीय इलमपरथी ए आर की कहानी किसी फिल्म जैसी लगती है। कभी दादा का हाथ पकड़कर एक कैंप में दर्शक बनकर पहुंचा यह चेन्नई का शांत लड़का आज दुनिया के टॉप चेस प्रोडिजीज में गिना जा रहा है। उसके संघर्ष, अनुशासन और तेज दिमाग ने साबित कर दिया कि बड़े सपने उम्र नहीं देखते।
शुरुआत वहां से, जहाँ किसी ने बुलाया तक नहीं था
साल 2022 में तमिलनाडु चेस एसोसिएशन ने पोलाची में एक चुनिंदा जूनियर खिलाड़ियों का कैंप रखा था। उन खिलाड़ियों को बुलाया गया था जो नेशनल जूनियर के लिए क्वालीफाई हो चुके थे। उस लिस्ट में 13 साल के इलमपरथी का नाम नहीं था। फिर भी वह अपने दादा का हाथ पकड़कर वहां पहुंच गया, क्योंकि वह सिर्फ चेस सीखना चाहता था।
कोच जीएम श्याम सुंदर मोहनराज ने जब इस शर्मीले बच्चे की आंखों में चमक देखी, तो उन्होंने इसे अपने साथ जोड़ने का फैसला किया। बस फिर क्या था, वही बच्चा तीन साल बाद भारत का 90वां ग्रैंडमास्टर बन गया।
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परिवार की मेहनत और मां-पिता का भरोसा
इलमपरथी के पिता रविकुमार सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और मां गायत्री साइंस टीचर। मां ने उसे पहली बार चेसबोर्ड से पहचान कराई, पिता ने नियम समझाए और बच्चा तुरंत खेल की बारीकियाँ पकड़ता चला गया।
सिर्फ पांच साल की उम्र में नेशनल खेलने लगा और अंडर-5, अंडर-7 और एशियन टाइटल तक जीत लिए। तभी परिवार को समझ आ गया था कि यह बच्चा साधारण नहीं है।
पैसों से ज्यादा मुश्किल था हौसले को बनाए रखना
चेस का सफर आसान नहीं था क्योंकि हर टूर्नामेंट कई दिनों तक चलता है, और यात्रा-रहने-खाने का खर्च काफी आता है। जैसे-जैसे इलम आगे बढ़ा, खर्च भी बढ़ते गए। इंटरनेशनल टूर्नामेंट्स में खेलने के लिए हर ट्रिप तीन से चार लाख रुपये तक का हो जाता था। कुछ स्कॉलरशिप और CSR सपोर्ट मिला, लेकिन सब आसान नहीं था।
इस बीच घर में एक और बड़ी जिम्मेदारी थी। इलमपरथी का छोटा भाई विशेष जरूरतों वाला बच्चा है, जिसे पूरे समय देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे में पिता उसके साथ हर टूर्नामेंट नहीं जा पाते थे। इस वजह से 2025 की शुरुआत से इलमपरथी ने अकेले यात्रा करना शुरू कर दिया और सिर्फ 16 साल की उम्र में दुनिया घूमते हुए ग्रैंडमास्टर बना।
सोशल मीडिया से दूर सिर्फ चेस से प्यार
इलमपरथी का रूटीन सिर्फ चेस के इर्द-गिर्द घूमता है। कोई सोशल मीडिया नहीं, कोई मूवी-सीरीज नहीं, बस खेल से प्यार और गुरु पर भरोसा।
कभी-कभी अकादमी में बच्चे रिफ्रेश होने के लिए क्रिकेट खेलते हैं और वहां भी इलमपरथी गज़ब की फुर्ती दिखाता है। विकेटकीपिंग में उसकी रिएक्शन स्पीड देखकर कोच भी हैरान हो जाते हैं। यही फुर्ती उसके चेस बोर्ड पर भी दिखती है। बड़े-बड़े ग्रैंडमास्टर्स जिन पहेलियों को हल करने में 15-20 मिनट लगाते हैं, वह उन्हें 3-5 मिनट में खत्म कर देता है।
परीक्षा, धैर्य और ग्रैंडमास्टर की जीत
इलमपरथी ने 2023 में इंटरनेशनल मास्टर का खिताब जीता था। वह ग्रैंडमास्टर बनने के दौरान कई बार बस आधा पॉइंट दूर रह गए, लेकिन उन्होंने जल्दबाजी नहीं की। उनके कोच ने भी उनसे कहा कि खिताब के पीछे नहीं, अच्छे खेल के पीछे भागो। यही धैर्य उन्हें बिजेल्जिना ओपन, बोस्निया में जीत तक ले आया। वहाँ वह आखिरी ग्रैंडमास्टर नॉर्म हासिल करके भारत 90वें ग्रैंडमास्टर बन गए।
लक्ष्य अब और भी बड़ा
कोच का मानना है कि ग्रैंडमास्टर बनना सिर्फ पहला कदम है। अब असली मंजिल वर्ल्ड चैंपियन बनना और लगातार टॉप पर बने रहना है। पिता का लक्ष्य भी यही है कि बेटा खुश रहे, खेल का आनंद ले और आगे बढ़ता रहे।
एक समय दादा का हाथ पकड़कर चेस कैंप में बिना बुलाए जाने वाला यह बच्चा आज दुनिया भर की बोर्ड्स पर भारत के लिए रोशनी बिखेर रहा है। यह तो बस शुरुआत है, क्योंकि उनका आसमान तक अभी चढ़ना बाकी है।
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