कहते हैं कि “Cricket is a great leveller” वो आपको जितनी तेजी से उठाता है, उतनी ही तेज़ी से नीचे गिराता है। खेल सभी को बराबरी देता है। फिर सामने कितनी ही ताकतवर टीम क्यों न हो। साल 2007 में जब T20 वर्ल्ड कप खेला जा रहा था, तब किसी को भी अंदाज़ा नहीं था कि ये कितना आगे तक जाएगा। इसका पहला संस्करण काफ़ी सफल रहा लेकिन इस बार इसमें बड़ा उलटफेर भी देखने को मिला जब ज़िम्बाब्वे ने माइटी ऑस्ट्रेलिया को हराया था।
ऑस्ट्रेलिया को हराना था बहुत मुश्किल

साल 2007 और ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट अपने शबाब पर था। मार्च में हुए वर्ल्ड कप में उन्होंने अपने विरोधियों को एकतरफा हराते हुए लगातार तीसरी बार वर्ल्ड कप जीता था। उनके सामने कोई भी टीम जीतना तो छोड़ो, कॉम्पटीशन देती हुई नहीं दिखती थी। लेकिन यही खेल की ख़ासियत है कि जब कोई आपको सीरियसली नहीं लेता है, फिर भी आप उन्हें ग़लत साबित कर सकते हैं।
12 सितम्बर को ज़िम्बाब्वे ने चटाई ऑस्ट्रेलिया को धूल
2007 में जब पहली बार T20 वर्ल्ड कप शुरू हुआ था, तो सभी ने ऑस्ट्रेलिया को चैंपियन मान लिया था। क्योंकि वे लगातार 3 वर्ल्ड कप जीत कर आ रहे थे और उनकी टीम भी काफ़ी मजबूत थी। उनका पहला मैच कमज़ोर मानी जाने वाली ज़िम्बाब्वे से था — वो टीम जिसने पिछले वर्ल्ड कप में एक भी मुकाबला नहीं जीता था।
कोई भी इस मैच को सीरियस ही नहीं ले रहा था, लेकिन 12 सितम्बर 2007 को जो होने वाला था, उसका किसी को कुछ अंदाज़ा ही नहीं था। उसके बाद जो हुआ, वो ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट के लिए एक काला दिन साबित हुआ।
चिगुंबुरा के आगे ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ हुए बेदम
ऑस्ट्रेलिया ने इस मैच में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला किया। उनके ओपनर एडम गिलक्रिस्ट और मैथ्यू हेडन को एल्टन चिगुंबुरा ने सस्ते में निपटा दिया। कप्तान रिकी पोंटिंग भी कुछ ख़ास नहीं कर सके। एंड्रू सायमंड्स और ब्रैड हॉज ने टीम को संभाला और एक बड़े स्कोर की तरफ ले जा रहे थे, लेकिन बाकी कोई भी उनका साथ नहीं दे सका। इसके कारण वे 138 रन ही बना पाए थे। एल्टन चिगुंबुरा ने शानदार गेंदबाज़ी करते हुए 4 ओवरों में मात्र 20 रन देकर 3 विकेट लिए थे।
भले ही ये स्कोर कम था, लेकिन ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ी को देखते हुए ये स्कोर डिफेंड किया जा सकता था। उनके पास एक से बढ़कर एक तुर्रम खाँ गेंदबाज़ थे, जो छोटे से छोटे टोटल को डिफेंड करने में भी महारत रखते थे। हालाँकि उनके सामने खड़ा था एक 21 वर्षीय युवा खिलाड़ी, जिसकी आँखों में थी जीत की भूख और ऑस्ट्रेलिया के गुमान को तोड़ने का सपना।
ज़िम्बाब्वे ने की अच्छी शुरुआत
ये खिलाड़ी कोई और नहीं बल्कि आगे ज़िम्बाब्वे की टीम का कप्तान और उनके लेजेंड्स में से एक — ब्रेंडन टेलर था। उनकी शुरुआत अच्छी हुई। ब्रेंडन और वुसी सिबांडा ने पहले विकेट के लिए अच्छी साझेदारी की। हालाँकि ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ों ने भी पलटवार करते हुए लगातार अंतराल में विकेट लेना शुरू कर दिया और मैच अपनी तरफ जाते हुए दिख रहा था, लेकिन टेलर हार मानने को राज़ी नहीं थे।
हैमिल्टन मसाकाड्ज़ा के साथ मिलकर 53 रन जोड़ दिए। लेकिन तभी 123 के स्कोर पर हैमिल्टन का विकेट गिर गया और अब अंतिम 9 गेंदों पर 16 रनों की ज़रूरत थी। ब्रेट ली ने अपनी अंतिम 3 गेंदों में सिर्फ 4 रन दिए। जीत के लिए अंतिम ओवर में 12 रन की ज़रूरत थी और गेंद नाथन ब्रैकन के हाथ में थी। टेलर ने पहली गेंद पर चौका जड़कर मैच को अपनी तरफ झुका दिया और अगली गेंद पर सिंगल लिया, जिससे अब 4 बॉल पर 7 रन चाहिए थे।
आखिरी क्षणों तक बना हुआ था मुकाबले में रोमांच
ब्रैकन की अगली दो गेंदों पर चिगुंबुरा ने पहले डबल और फिर सिंगल लेकर 3 रन बटोरे। अब स्ट्राइक वेल-सेट खेल रहे टेलर के पास थी। अंतिम 2 गेंदों में 4 रनों की ज़रूरत थी। 21 वर्षीय युवा खिलाड़ी ने पूरा प्रयास कर दिया था लेकिन अभी भी कुछ काम बचा हुआ था। काफ़ी ज़्यादा दबाव था क्योंकि अब जीत एक शॉट दूर थी।
तभी बारिश शुरू हो गई लेकिन उसका मैच के नतीजे पर कोई असर नहीं पड़ना था। ब्रैकन ने गेंद को काफ़ी सुखाया लेकिन 5वीं गेंद में वो दिशा भटक गए और पैर में फेंक बैठे। टेलर ने फ्लिक करने का प्रयास किया लेकिन पैड्स में लगकर गेंद फाइन लेग के पास से 4 रन चली गई और ज़िम्बाब्वे ने मैच जीत लिया।
ब्रेंडन टेलर के आगे ऑस्ट्रेलिया टीम हुई ध्वस्त
21 वर्षीय युवा ने अपने हार न मानने के जज़्बे से वो कर दिखाया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उनके आगे उस माइटी ऑस्ट्रेलिया ने घुटने टेके थे जो लगातार 4 ICC टाइटल और 3 वर्ल्ड कप जीतकर आ रही थी। जिनके आगे वर्ल्ड इलेवन भी पानी माँगती थी। लेकिन उस दिन 21 वर्षीय ब्रेंडन टेलर ने माइटी ऑस्ट्रेलियंस के हाथों से जीत छीन ली थी और दुनिया को दिखाया कि उनसे न सिर्फ़ टक्कर ली जा सकती है बल्कि उन्हें हराया भी जा सकता है।

