Zimbabwe Cricket ends future selection plans as Sean Williams in rehab for drug addiction: शॉन विलियम्स ने लगभग दो दशकों तक जिम्बाब्वे क्रिकेट के लिए लगातार अपनी भूमिका निभाई और देश के भरोसेमंद बल्लेबाजों में पहचान बनाई। इतने लंबे अंतरराष्ट्रीय सफर में उन्होंने कई मौकों पर टीम को मुश्किल परिस्थितियों से बाहर निकाला और कई अहम मैचों में निर्णायक योगदान दिया। इस दौरान वह टीम में एक अनुभवी और भरोसेमंद क्रिकेटर के रूप में जाने जाते रहे और कई युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा भी बने।
अब यह सफर एक कठिन मोड़ पर पहुंच गया है, क्योंकि उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि वह ड्रग एडिक्शन से जूझ रहे हैं और इस कारण उन्होंने स्वेच्छा से रिहैब का रास्ता चुना है। यह खुलासा ही उनके लिए चुनौती से भरा था, लेकिन इसके बाद जिम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड ने एक बड़ा फैसला लिया और साफ कर दिया कि अब उन्हें भविष्य में चयन के लिए नहीं देखा जाएगा। साथ ही बोर्ड ने यह भी कहा कि उनका कॉन्ट्रैक्ट 2025 के बाद रिन्यू नहीं किया जाएगा।
ZC का कड़ा रुख और बयान
Zimbabwe Cricket के अनुसार यह फैसला अचानक नहीं आया, बल्कि लंबे समय से चली आ रही अनुशासनात्मक चुनौतियों और खिलाड़ी की उपलब्धता से जुड़ी समस्याओं के बाद लिया गया। बोर्ड ने बताया कि विलियम्स ने टीम से जुड़ने से पहले अफ्रीका क्वालीफायर टूर्नामेंट के समय निजी कारणों से खुद को अलग कर लिया था। उस समय यह कारण स्पष्ट नहीं था और बाद में आंतरिक जांच के दौरान उन्होंने स्वयं यह स्वीकार किया कि वह नशे की लत से जूझ रहे हैं।
बोर्ड ने उनके रिहैब फैसले की सराहना की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि टीम से हटना और संभावित डोप टेस्ट की स्थिति में अनुपस्थित रहना प्रोफेशनल स्टैंडर्ड के खिलाफ है। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुशासन और उपलब्धता किसी भी खिलाड़ी के लिए मूल शर्तें हैं और सालों से इस क्षेत्र में सामने आई समस्याओं ने स्थिति को और जटिल कर दिया।
शानदार करियर, लेकिन विवादों ने छोड़ी छाप
विलियम्स के करियर की बात करें तो उन्होंने 2005 में डेब्यू किया और 273 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले। 8000 से ज्यादा रन और वनडे में 37.53 की औसत के साथ वह जिम्बाब्वे के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाजों में शामिल रहे। उनके आठ शतक और 37 अर्धशतक इस बात का सबूत हैं कि उन्होंने अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन किया और देश के सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में जगह बनाई।
लेकिन उनके करियर में सिर्फ रिकॉर्ड और प्रदर्शन की बात नहीं रही। बार बार बोर्ड से मतभेद, अनुशासनात्मक मुद्दों में फंसना और समय समय पर टीम से हटना भी चर्चाओं का हिस्सा रहे। 2006 में अंडर 19 टीम का नेतृत्व करने के बाद भी उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट ठुकराया और विदेश में खेलने की कोशिश की। फिर वापस लौटे, फिर से बाहर गए और दोबारा वापसी की। इसके बाद 2014 में भी ट्रेनिंग कैंप में निरंतरता की कमी और अनुशासन संबंधी मामले सामने आए।
क्या बची है आगे वापसी की उम्मीद?
यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या शॉन विलियम्स फिर कभी जिम्बाब्वे की जर्सी में नजर आएंगे। मौजूदा स्थिति में इसका जवाब मुश्किल है, क्योंकि बोर्ड ने अपना स्पष्ट रुख रखा है। हालांकि, खेल में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जहां खिलाड़ी मुश्किल समय से बाहर निकले और दोबारा कमबैक किया। विलियम्स जैसा अनुभव रखने वाले खिलाड़ी के लिए यह संभव है, लेकिन इसका रास्ता लंबा और अनुशासन से भरा होगा।
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