न्यूजीलैंड के खिलाफ विशाखापत्तनम में एक्सपेरिमेंट करने के उद्देश्य से उतरी टीम इंडिया को नतीजे से ज्यादा अहम जवाब शिवम दुबे के बल्ले से मिले।
भारत और न्यूजीलैंड के बीच विशाखापत्तनम में खेले गए चौथे टी20 अन्तर्राष्ट्रीय (T20I) मुकाबले को सिर्फ हार या जीत के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। यह मुकाबला भारत के लिए एक प्रयोग था, जहां टीम मैनेजमेंट ने जानबूझकर खुद को चुनौती दी। इसी एक्सपेरिमेंटल मैच ने शिवम दुबे के बदले हुए किरदार को साफ तौर पर सामने रख दिया।
गौरतलब हो कि, इस सीरीज में 3-0 की बढ़त के बाद भारत ने चौथे मुकाबले में बड़ा जोखिम उठाया था। उन्होंने विशाखापत्तनम की बैटिंग फ्रेंडली पिच पर अपनी टीम की बल्लेबाजी को लंबा करने के बजाय सीमित किया, ताकि यह समझा जा सके कि दबाव की स्थिति में खिलाड़ी कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। इस फैसले का सबसे सीधा असर शिवम दुबे पर पड़ा, जिनके सामने कोई सेफ्टी नेट नहीं था।
जानबूझकर बनाई गई मुश्किल स्थिति
ईशान किशन की हल्की चोट को एक मौके की तरह इस्तेमाल किया गया और भारत इस मैच में सिर्फ छह बल्लेबाजों के साथ उतरा। रिंकू सिंह को ऊपर भेजा गया और ऑलराउंडर्स से गेंदबाजी तक नहीं कराई गई। इसका मतलब साफ था कि यह मैच नतीजे से ज्यादा जवाब तलाशने के लिए खेला जा रहा था।
216 रनों के बड़े लक्ष्य का पीछा कर रही टीम इंडिया की ओर से जब शिवम दुबे बल्लेबाजी करने आए, तब हालात भारत के पक्ष में नहीं थे। उनके मुख्य और विस्फोटक बल्लेबाज अभिषेक शर्मा पहली गेंद पर आउट हो चुके थे।
पिछले दो मैचों में बल्ले से तबाही मचाने वाले कप्तान सूर्यकुमार यादव एक रिफ्लेक्स कैच में पवेलियन लौट चुके थे, जबकि लगातार खराब फॉर्म में चल रहे संजू सैमसन भी आउट हो चुके थे। उससे भी बड़ी बात कि रन चेज के समय ओस भी नहीं आई, जिससे पिच और भी धीमी होती जा रही थी।
यह वही स्थिति थी, जहां किसी भी ऑलराउंडर के लिए असली परीक्षा शुरू होती है। यहां कोई सेकेंड रोल नहीं था, न गेंदबाजी का सहारा और न ही नीचे बल्लेबाजी की गहराई थी। इस बड़े और मुश्किल रन चेज को जिंदा रखना अब पूरी तरह से दुबे के बल्ले पर ही निर्भर था।
वह ओवर जिसने शिवम दुबे की छवि बदल दी
टीम इंडिया के रन चेज के दौरान दसवें ओवर में एक ऐसा पल आया, जिसने शिवम दुबे की बदली हुई छवि को पूरी तरह बयान कर दिया। हार्दिक पांड्या के आउट होने के बाद दुबे ने आते ही अपनी पहली गेंद पर मिचेल सैंटनर के खिलाफ 101 मीटर का छक्का लगाया और अगली गेंद पर सिंगल लेकर स्ट्राइक अपने पास रखी।
आमतौर पर यहां अगले ओवर में विपक्षी टीम का कप्तान किसी तेज गेंदबाज को गेंदबाजी के लिए लाता, क्योंकि दुबे को लंबे समय तक पेस के खिलाफ कमजोर माना जाता रहा है। लेकिन न्यूजीलैंड के कप्तान ने तेज गेंदबाज की जगह पार्ट टाइम स्पिनर ग्लेन फिलिप्स को गेंद सौंप दी। यह साफ बताता है कि, अब शिवम दुबे वह बल्लेबाज नहीं रहे, जिन्हें सिर्फ गति से परेशान किया जा सके, बल्कि विपक्ष अब उनके लिए अलग प्लान बना रहा है।
रन चेज में दुबे ने लड़ी अकेली लड़ाई
जब दुबे बल्लेबाजी कर रहे थे, तब भारत की जीत की संभावना सिर्फ दो प्रतिशत थी। उनके आउट होने से ठीक पहले तक यह लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। भले ही भारत यह मैच नहीं जीत सका और यह घरेलू मैदान पर उनकी दूसरी सबसे बड़ी हार रही, लेकिन यह चेज तभी तक जिंदा दिखा, जब तक दुबे क्रीज पर थे।
इस मैच में दुबे ने सिर्फ 15 गेंदों में अर्धशतक पूरा किया, जो टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में भारत की तीसरी सबसे तेज फिफ्टी है। उन्होंने 23 गेंदों में 3 चौकों और 7 छक्कों की मदद से 65 रन बनाए। इस दौरान उन्होंने स्पिन के खिलाफ 9 गेंदों पर 36 रन बनाए, जहां उनका स्ट्राइक रेट 400 रहा।
लेकिन असली फर्क तेज गेंदबाजों के खिलाफ पेस के खिलाफ उनके द्वारा 14 गेंदों पर बनाए गए 29 रन से पड़ा, जिसने न्यूजीलैंड को एकतरफा रणनीति अपनाने से रोका।
बदली हुई सोच और साफ रोल
मैच के बाद साफ दिखा कि दुबे अब अपने रोल को अच्छी तरह समझते हैं। उन्हें पता है कि गेंदबाज उनके खिलाफ क्या प्लान बनाएगा और वह पहले से उसके जवाब के लिए तैयार रहते हैं। यही वजह है कि अब विपक्ष उन्हें रोकने की कोशिश करता है, न कि इंतजार करता है कि वह खुद गलती करें।
दुबे खुद मानते हैं कि यह बदलाव अनुभव से आया है। लगातार खेलने, गेंदबाजी करने और दबाव झेलने से उनकी सोच साफ हुई है। वह जानते हैं कि उनकी ताकत क्या है और कहां हमला करना है।
हार में छिपा सबसे बड़ा जवाब
भले ही भारत यह मुकाबला नहीं जीत सका, लेकिन टीम को वह जवाब मिल गया, जिसकी उन्हें तलाश थी। यह साफ हो गया कि सीमित बल्लेबाजी के बावजूद कौन सा खिलाड़ी दबाव में खड़ा रह सकता है।
इस एक्सपेरिमेंटल मैच ने यह दिखा दिया कि शिवम दुबे अब भारत की कमजोर कड़ी नहीं रहे। अब वह ऐसे बल्लेबाज हैं, जिनके लिए विपक्ष पहले से योजना बनाता है। यही किसी खिलाड़ी के आगे बढ़ने की सबसे बड़ी पहचान होती है।
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