Paris Paralympics 2024: पेरिस पैरालंपिक 2024 (Paris Paralympics 2024) के खेलों में इस बार भारत का शानदार प्रदर्शन जारी है। भारत के पैरा एथलीट योगेश कथुनिया ने पेरिस पैरालंपिक 2024 में पुरुषों के एफ56 चक्का फेंक स्पर्धा में 42.22 मीटर के सत्र के अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास के साथ रजत पदक जीत लिया है। क्यूंकि इससे पहले योगेश ने टोक्यो पैरालिंपिक 2020 (Paris Paralympics 2024) में भी इसी स्पर्धा में रजत पदक जीता था।

यहां पर खेलते हुए भारत के इस पैरा एथलीट योगेश कथुनिया ने अपने 6 प्रयासों में से अपने पहले प्रयास में ही अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। अभी तक इन्होने अपने पूरे करियर में कई पदक जीते है। इस बार इनका लक्ष्य केवल स्वर्ण पदक जीतना था। लेकिन इस बार भी वह ऐसा नहीं कर पाए और उनको रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। वहीं इस बार ब्राजील के क्लॉडनी बतिस्ता ने 46.86 मीटर के थ्रो के साथ पैरालिंपिक रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता है।

इस बार पेरिस पैरालिंपिक 2024 (Paris Paralympics 2024) के खेलों में यह भारत का 8वां पदक था। इसके अलावा इस बार पैरा एथलीट में यह भारत का चौथा पदक था। वहीं इससे पहले 1 सितंबर को भारत ने एथलेटिक्स में एक कांस्य और एक रजत पदक जीता था। तब ऊंची कूद में पैरा एथलीट निषाद कुमार ने रजत पदक जीता था जबकि प्रीति पाल ने रविवार को 200 मीटर कांस्य पदक के साथ एथलेटिक्स में अपना दूसरा पदक हासिल किया था।
Paris Paralympics 2024 कौन हैं पैरा एथलीट योगेश कथुनिया :-
इनका जन्म 3 मार्च, 1997 को भारत के बहादुरगढ़ में हुआ था। योगेश कथुनिया एक प्रेरणादायक भारतीय पैरालंपिक एथलीट भी हैं। क्यूंकि इन्होने डिस्कस थ्रो में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए अविश्वसनीय चुनौतियों का सामना किया था। तभी तो उनकी यह यात्रा दृढ़ संकल्प, लचीलापन और उनके परिवार के अटूट समर्थन की शक्ति का प्रमाण है। केवल नौ साल की छोटी उम्र में योगेश को गिलियन-बैरे सिंड्रोम नमक बीमारी हो गई। यह एक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल विकार है।

इस बीमारी के कारण योगेश को दो साल तक व्हीलचेयर पर रहना पड़ा था। इस बीमारी के कारण उनके शरीर की नशों पर काफी ज्यादा प्रभाव पड़ा था। जिसके चलते हुए बचपन में उनकी चलने – फिरने की क्षमता को छीन लिया था। तब उनकी माता मीना देवी ने अपने बेटे को छोड़ने से इनकार कर दिया था। तब उनकी माँ ने अपने बेटे को अपनी ताकत वापस पाने में मदद करने के लिए फिजियोथेरेपी सीखी और अपने अथक प्रयासों से, वह तीन साल के भीतर फिर से चलने में सक्षम हो गया था।
साल 2016 में योगेश का पैरा स्पोर्ट्स से परिचय हुआ था। उस समय वह दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ रहे थे। तब छात्र संघ के महासचिव सचिन यादव ने उन्हें पैरा एथलीटों के वीडियो दिखाकर खेलों को अपनाने के लिए प्रेरित किया था। इस अनुभव के चलते हुए योगेश के अंदर जुनून जागा और फिर इसके बाद उनको जल्द ही डिस्कस थ्रोइंग का शौक हो गया था। इसके बाद फिर उन्होंने पैरा एथलेटिक्स स्पर्धाओं में भाग लेना शुरू कर दिया और जल्द ही उसकी प्राकृतिक प्रतिभा चमक उठी थी।

इसके बाद फिर साल 2018 में योगेश ने बर्लिन में विश्व पैरा एथलेटिक्स यूरोपीय चैंपियनशिप में 45.18 मीटर डिस्कस फेंककर F36 श्रेणी में विश्व रिकॉर्ड बनाया था। तब उनकी इस उपलब्धि ने पैरा एथलेटिक्स में उनके उल्लेखनीय करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद फिर उन्होंने टोक्यो में 2020 ग्रीष्मकालीन पैरालिंपिक में पुरुषों की डिस्कस थ्रो F56 स्पर्धा में रजत पदक जीता, एक उपलब्धि जिसने उन्हें 2021 में अर्जुन पुरस्कार दिलाया।
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