History Of Archery and Olympics Journey: तीरंदाजी एक ऐसा खेल है, जिसमें धनुष से तीर चलाकर निशाने पर लगाया जाता है। पुराने समय में इसे शिकार और युद्ध दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर लगभग पूरी दुनिया में धनुष एक जरूरी हथियार माना जाता था। साल 1900 में पहली बार ओलंपिक गेम्स में तीरंदाजी को जगह मिली। आज के समय में यह खेल अपनी खास पहचान बना चुका है।
तीरंदाजी का आविष्कार कब और कहाँ हुआ था?
18वें राजवंश (1567-1320 ईसा पूर्व) के समय मिस्र के फिरौन तीरंदाजी को बहुत पसंद करते थे। कुछ समय बाद चीन में झोउ वंश (1046-256 ईसा पूर्व) के दौरान पहली बार तीरंदाजी की प्रतियोगिताएँ हुईं, जिनमें वहाँ के राजा और शासक वर्ग हिस्सा लिया करते थे। आगे चलकर इंग्लैंड ने क्रेसी, एगिनकोर्ट और पॉइटियर्स जैसी लड़ाइयों में धनुष की मदद से जीत हासिल की।
करीब 1200 ईसा पूर्व में हित्ती और अश्शूरी योद्धाओं ने रथ पर सवार होकर तीर चलाने की नई परंपरा शुरू की। वे कण्डरा, सींग और लकड़ी से खास तरह के धनुष बनाते थे, जिनका आकार रिकर्व होता था। इस वजह से धनुष छोटे लेकिन बहुत शक्तिशाली बन जाते थे। इनसे सैनिक घोड़ों की पीठ पर बैठकर भी आसानी से तीर चला सकते थे। इसी कारण वे युद्ध में बेहद खतरनाक साबित होते थे।
तीरंदाजी खेल के नियम क्या हैं
तीरंदाजी की हर शैली के अपने अलग नियम होते हैं। इसमें यह तय किया जाता है कि कौन-सा धनुष इस्तेमाल होगा और निशाना कैसे लगाया जाएगा।
ओलंपिक गेम्स में रिकर्व धनुष (Recurve Bow) और लक्ष्य तीरंदाजी (Target Archery) होती है। इसमें खिलाड़ी 70 मीटर दूर रखे गए निशाने पर तीर चलाते हैं। यह खेल सेट प्वाइंट्स के आधार पर खेला जाता है:
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एक सेट जीतने पर खिलाड़ी को 2 अंक मिलते हैं।
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अगर सेट बराबरी पर खत्म हो, तो दोनों खिलाड़ियों को 1-1 अंक दिया जाता है।
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जो खिलाड़ी सबसे पहले 6 अंक बना लेता है, वही विजेता होता है।
ओलंपिक के अलावा तीरंदाजी की और भी शैलियाँ होती हैं, जैसे:
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फ़ील्ड आर्चरी (Field Archery): इसमें खिलाड़ी खुले मैदान या जंगल जैसी जगहों पर अलग-अलग दूरी और ऊँचाई पर लगे निशानों पर तीर चलाते हैं।
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इनडोर आर्चरी (Indoor Archery): यह खेल हॉल या इनडोर जगहों पर खेला जाता है, जिसमें आमतौर पर 18 मीटर की दूरी पर निशाना होता है।
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पैरा आर्चरी (Para Archery): इसमें दिव्यांग खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं।
इन खेलों में कभी-कभी कंपाउंड बो (Compound Bow) या बेयर बो (Bare Bow) का भी इस्तेमाल किया जाता है।
तीरंदाजी में अंक कैसे प्राप्त किए जाते हैं?
तीरंदाजी में हर तीर से 1 से 10 तक अंक मिल सकते हैं। निशाने पर अलग-अलग गोल घेरे बने होते हैं, जिनमें सबसे बाहर वाला हिस्सा कम अंक और बीच की ओर जाने पर ज़्यादा अंक देता है।
- अगर तीर दो रिंग की लाइन पर लगता है, तो खिलाड़ी को बड़े स्कोर का अंक दिया जाता है। जैसे: अगर तीर 8 और 9 के बीच की लाइन पर लगता है तो 9 अंक मिलेंगे।
- बीच में एक बहुत छोटा गोल भी होता है। अगर खिलाड़ी तीर को ठीक उसी पर मारता है तो उसे 10 अंक मिलते हैं।
- हर खिलाड़ी को एक सेट में 3 तीर चलाने का मौका दिया जाता है।
- सेट खत्म होने पर जिसके अंक सबसे ज़्यादा होते हैं, वही सेट जीतता है और उसे मैच में 2 अंक मिलते हैं।
ओलंपिक में तीरंदाजी को कब शामिल किया गया
साल 1900 में तीरंदाजी पहली बार ओलंपिक गेम्स में शामिल की गई। इसके बाद यह खेल 1904, 1908 और 1920 के ओलंपिक में भी खेला गया। लेकिन बाद में इसे ओलंपिक से हटा दिया गया और करीब 52 साल तक यह खेल ओलंपिक का हिस्सा नहीं रहा। फिर 1972 में तीरंदाजी की वापसी हुई और तब से अब तक यह लगातार ओलंपिक गेम्स में शामिल है।
ओलंपिक इतिहास में सबसे सफल तीरंदाज़ बेल्जियम के ह्यूबर्ट वैन इनिस माने जाते हैं। उन्होंने 1900 और 1920 के ओलंपिक गेम्स में कुल 6 गोल्ड मेडल और 3 सिल्वर जीते।
तीरंदाजी में कुशल प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी
दुनिया के सबसे बेहतरीन तीरंदाज़ कोरिया गणराज्य से आते हैं। 1988 में जब सियोल ने ओलंपिक गेम्स की मेज़बानी की, उसके बाद से इस खेल पर कोरिया का दबदबा बना हुआ है। टोक्यो 2020 ओलंपिक तक कोरिया ने तीरंदाजी में कुल 43 पदक जीते हैं, जिनमें से 27 स्वर्ण पदक हैं।
कुछ मशहूर तीरंदाज़ों के नाम इस प्रकार हैं:
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एन सैन (कोरिया)
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ऋषभ यादव (भारत)
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किम वूजिन (कोरिया)
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ब्रैडी एलिसन (अमेरिका)
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लिम सिह्योन (कोरिया)
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