भारत में क्रिकेट, फुटबॉल और हॉकी सबसे मशहूर खेल हैं, लेकिन इस देश की पुरानी परंपराओं और इतिहास में ऐसे बहुत से खेल भी हैं जो सदियों से खेले जा रहे हैं। फिर भी, ये खेल आज तक आधुनिक दुनिया में ज़्यादा मशहूर नहीं हो पाए हैं। हाल ही में कबड्डी ने भारतीय खेलों में अपनी पहचान बनाई है, लेकिन अभी भी कई पुराने भारतीय खेल हैं जिनके बारे में ज़्यादातर लोगों ने शायद ही सुना भी नहीं होगा। आज हम ऐसे तीन खेल के बारे में जानते हैं।
1. वल्लम काली – केरल की स्नेक बोट रेस

वल्लम काली, जिसे केरल नौका दौड़ भी कहा जाता है, दक्षिण भारत का एक बहुत सुंदर और पारंपरिक त्योहार है। यह हर साल मलयालम महीने चिंगम में मनाया जाता है, जो आम तौर पर अगस्त या सितंबर में आता है। इस खेल में कई लंबी नावें नदी में एक-दूसरे से दौड़ लगाती हैं।
यह नौका दौड़ मुख्य रूप से ओणम के फसल त्योहार के समय आयोजित की जाती है। केरल में जुलाई से सितंबर के बीच चार बड़ी नौका दौड़ें होती हैं। नेहरू ट्रॉफी रेस, पयप्पड़ जलोत्सवम, अरनमुला बोट रेस, और चंपाकुलम मूलम। ये सभी दौड़ें खूबसूरत शहर अल्लेप्पी और उसके आसपास होती हैं।
इस समय नदी पर सैकड़ों रंग-बिरंगी नावें दिखाई देती हैं। लोग पूरे जोश के साथ नाव चलाते हैं, और नावों को सुंदर छातों और झंडों से सजाया जाता है, जिससे पूरा दृश्य बहुत आकर्षक लगता है।
2. थांग-ता – मणिपुर की मार्शल आर्ट

थांग ता, जिसे ‘तलवार और भाले की कला’ कहा जाता है, पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर की पारंपरिक युद्ध कला है। इसमें तलवार, भाला और खंजर जैसे हथियारों का इस्तेमाल खास तरह की लय और सांसों के तालमेल के साथ किया जाता है। यह कला मणिपुर की पुरानी वीर परंपरा का हिस्सा मानी जाती है।
थांग ता का असली नाम हुयेन लाललोंग है, जिसका अर्थ है “सुरक्षा की विधि” यह केवल युद्ध करना सिखाने वाली कला नहीं है, बल्कि इसमें साँस नियंत्रण, ध्यान और धार्मिक अनुष्ठान भी शामिल हैं। यह शरीर और मन दोनों को संतुलित करने वाली एक संपूर्ण प्रणाली है। इस कला के कुछ रूप केवल धार्मिक या विशेष अवसरों पर ही दिखाए जाते हैं। जैसे कि एक खास भाले का प्रदर्शन केवल अंतिम संस्कार के समय किया जाता है।
3. जल्लीकट्टू – तमिलनाडु का बैल-वशीकरण खेल

जल्लीकट्टू नाम दो तमिल शब्दों से बना है- सल्ली (यानी सिक्के) और कट्टू (यानी बंधा हुआ)। यह उन सिक्कों को दर्शाता है जो बैल के सींगों पर बांधे जाते हैं, और प्रतिभागियों को उन्हें जीतने के लिए बैल को पकड़ना होता है।
जल्लीकट्टू तमिलनाडु में पोंगल के त्योहार के दौरान खेला जाने वाला एक पुराना पारंपरिक खेल है। इसमें लोग बैल को वश में करने की कोशिश करते हैं। यह खेल तमिल संस्कृति, वीरता और मनुष्य और पशु के बीच के मजबूत रिश्ते का प्रतीक है। इसे खासतौर पर मट्टू पोंगल के दिन मनाया जाता है, जो पोंगल उत्सव का दूसरा दिन होता है। इस दिन गाय-बैलों का सम्मान किया जाता है क्योंकि वे खेती और गाँव की जिंदगी का अहम हिस्सा हैं। यह खेल बैल की लड़ाई जैसा नहीं होता। इसमें खिलाड़ी दौड़ते हुए बैल के कूबड़ को पकड़ते हैं, लेकिन उसे चोट नहीं पहुंचाते। यह खेल खिलाड़ियों की ताकत, फुर्ती और साहस को दिखाने का तरीका है।

