Team India Debut for Kranti Gaur: क्रांति गौड़ की कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं, हौसले और मेहनत की भी है। उस 70 किलोमीटर के फासले ने उनके लिए वो दरवाज़ा खोला, जिसके पार टीम इंडिया जैसी मंज़िल उनका इंतज़ार कर रही थी।
21 साल की राइट-आर्म फास्ट बॉलर क्रांति गौड़ ने श्रीलंका में चल रही महिला ट्राई नेशन सीरीज़ के फाइनल मुकाबले में डेब्यू किया। बिना कोई ग्रुप स्टेज मैच खेले सीधे फाइनल में उतारना बताता है कि टीम मैनेजमेंट को उनके टैलेंट पर पूरा भरोसा है। और भरोसा यूं ही नहीं मिला, उसके पीछे संघर्ष और रफ्तार से भरी उनकी कहानी है।
70 किलोमीटर का सफर बना टर्निंग पॉइंट

क्रांति ने जब लेदर बॉल से पहला मैच खेला, तब उनकी परफॉर्मेंस ने सभी को चौंका दिया। इसके बाद उन्हें जतारा बुलाया गया। यह एक छोटा सा शहर जो उनके गांव से 70 किलोमीटर दूर था। वहां हुए एक मुकाबले में उनकी रफ्तार और सटीक लाइन-लेंथ ने कोच राजीव बिलथरे का ध्यान खींचा। यहीं से उनकी तकदीर बदल गई।
कोच की नज़र, पिता का भरोसा
कोच राजीव बिलथरे ने तुरंत उनके पिता से संपर्क किया और कहा, “हम आपकी बेटी को क्रिकेटर बना सकते हैं, बस उसे हमें सौंप दीजिए।” उनकी यह बात सुनकर क्रांति के पिता मान गए और फिर क्रांति को छत्तरपुर में कोच की देखरेख में ट्रेनिंग मिलने लगी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसके बाद वह वनडे टूर्नामेंट, फिर उन्हे WPL में यूपी वॉरियर्ज़ से 10 लाख का कॉन्ट्रैक्ट मिला और अब टीम इंडिया में डेब्यू करके खुद को साबित कर दिया।
समाज के तानों के बीच परिवार की दीवार बनी ढाल
छह भाई-बहनों में सबसे छोटी क्रांति को समाज की बातों ने कई बार तोड़ा, लेकिन परिवार की सपोर्ट ने हर बार उन्हें जोड़ा। लोगों ने कहा कि “लड़की है, क्या क्रिकेट खेलेगी?”, लेकिन उनके मां-बाप ने कहा, “खेलना है तो खेल, हम साथ हैं।” और आज वही लड़की भारत के लिए खेल रही है।
क्रांति का डेब्यू सिर्फ क्रिकेट नहीं, उम्मीद की कहानी है
क्रांति गौड़ का डेब्यू उन लाखों लड़कियों के लिए उम्मीद की एक चिंगारी है, जो छोटे शहरों में सपने तो देखती हैं लेकिन मंज़िल उन्हें दूर लगती है। सिर्फ 70 किलोमीटर ने क्रांति को बदल दिया, क्योंकि उन्होंने हर एक किलोमीटर पर खुद को साबित किया।
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