वैसे तो भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी है, लेकिन यहां के लोग सबसे ज्यादा क्रिकेट की दिवानगी सर चढ़कर बोलती है। फैंस क्रिकेट के बारे में हर वो जानकारी रखते हैं जो क्रिकेट के खेल में आती है। लेकिन फिर भी क्रिकेट इतिहास में कुछ ऐसे नियम भी हैं। जिनके कारण के बारे में कट्टर से कट्टर फैन को भी नहीं पता होता। जी हां आज के इस लेख में हम एलबीडब्यू के बारे में बताने जा रहे हैं कि आखिर ये क्रिकेट में कब और क्यों लाया गया।
क्रिकेट में बल्लेबाज कई तरह से आउट होता है और इन्हीं में से एक तरीका एलबीडब्ल्यू के द्वारा भी आउट होना है। बता दें कि ये नियम लंबे समय तक क्रिकेट इतिहास में बहस का मुद्दा रहा है। आज से कुछ साल पहले एलबीडब्ल्यू आउट होने का फैसला पूरी तरह से ऑन-फील्ड अंपायर पर निर्भर होता था। इस दौरान कई बार ऐसा भी हुआ है, जब एलबीडब्ल्यू आउट का फैसला अंपायर की चूक के कारण चर्चा का विषय बना। यहीं कारण रहा कि इसके फैसलों को लेकर बार-बार नई तकनीक का सहारा लिया गया। समय के साथ चीजें बदलती गई। स्लो-मोशल, वीडियो, बॉल ट्रैकिंग और अब डीआरएस तकनीकी के आने से एलबीडब्ल्यू आउट के फैसलों में काफी हद तक सुधार नजर आने लगा है।
एलबीडब्यू की जरूरत क्यों पड़ी?
जैसे जैसे क्रिकेट के नियमों में बदलाव होने लगा ठीक वैसे की क्रिकेट की सामग्री में वक्त के साथ बदलाव देखने को मिला। क्रिकेट के बल्ले बाद के सालों में सीधे होने लगे। इस दौरान बल्लेबाज गेंदों को विकेट में जाने से रोकने के लिए पैड का इस्तेमाल करने लगे। उस वक्त इसे पैड प्ले के तौर जाना जाता था। पैड प्ले की वजह से क्रिकेट मैच काफी बोरिंग होने लगे। इसके साथ ही ये माना गया कि ये गेंदबाजों के साथ अन्याय हो रहा है। इसके बाद साल 1774 के कानून के मसौदे में शामिल एक नियम बदला गया। इसके बाद क्रिकेट में एक नया नियम लागू किया गया। जिसे आज हम एलबीडब्ल्यू के रूप में जानते हैं। इस दौरान ये तय किया गया कि बल्लेबाज जानबूझकर स्टंप में जाने वाली गेंद को रोकता है। लेकिन अब स्टंप में जाने वाली गेंद को रोकने पर बल्लेबाज को आउट करार दिया गया। इसके बाद एलबीडब्ल्यू के नियम में कई बार संसोधन किए गए।
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