Saturday, June 20

चावल के खेतों में मेहनत करने वाली एक गांव की लड़की Rupa Bayor ने हौसले और संघर्ष के दम पर खुद को एशिया की नंबर 1 ताइक्वांडो खिलाड़ी बना लिया।

भारत की 24 साल की ताइक्वांडो खिलाड़ी रूपा बेयोर (Rupa Bayor) ने ऐसा इतिहास रचा है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अरुणाचल प्रदेश से आने वाली रूपा एशिया की नंबर 1 और वर्ल्ड रैंकिंग में छठे नंबर की खिलाड़ी बन गई हैं। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि वह भारत की पहली ताइक्वांडो खिलाड़ी हैं, जिन्होंने वर्ल्ड रैंकिंग के टॉप 10 में जगह बनाई है।

रूपा की यह सफलता किसी आसान रास्ते से नहीं आई। गरीबी, संसाधनों की कमी और पारिवारिक संघर्षों के बीच उन्होंने खुद को बार बार साबित किया। उनकी कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जो हालात से हार मानने से इनकार करता है।

अरुणाचल के छोटे गांव से शुरुआत

रूपा बेयोर का जन्म अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी (Upper Subansiri) जिले के डापोरिजो (Daporijo) के पास सिप्पी गांव में हुआ। उनका परिवार बेहद साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर था। पिता का साया बचपन में ही उठ गया और उनकी मां यामी बेयोर ने अकेले ही परिवार को संभाला।

मां खुद अनाथ थीं और चावल के खेतों में काम करके बेटी की परवरिश की। रूपा ने भी बचपन में खेतों में काम किया और यहीं से उन्होंने संघर्ष का असली मतलब सीखा।

कराटे से ताइक्वांडो तक का सफर

रूपा के मामा एक कराटे मास्टर थे। उन्होंने रूपा की फुर्ती और आक्रामकता को पहचाना और साल 2015 में उन्हें मार्शल आर्ट्स से जोड़ा। शुरुआत कराटे से हुई, लेकिन जल्द ही रूपा का झुकाव ताइक्वांडो की ओर हो गया। पहले यह सिर्फ टाइमपास था, लेकिन धीरे धीरे यही खेल उनका सपना और फिर उनका जीवन बन गया।

संसाधनों की कमी और वीजा की परेशानी

एक छोटे गांव में रहने की वजह से रूपा के पास न तो बेहतर ट्रेनिंग सुविधाएं थीं और न ही पैसों का सहारा था। टूर्नामेंट खेलने और यात्रा के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा। साल 2022 में हांग्झू एशियन गेम्स के लिए उन्हें वीजा नहीं मिल पाया, जो उनके करियर का बड़ा झटका था। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और खुद को और मजबूत बनाया।

मुंबई में बदली किस्मत

साल 2021 में रूपा मुंबई शिफ्ट हुईं और इंडो-कोरियन ताइक्वांडो एकेडमी में कोच अभिषेक दुबे के साथ ट्रेनिंग शुरू की। यहां उन्हें प्रोफेशनल ट्रेनिंग मिली और उनके खेल में निखार आया। वेलस्पन सुपर स्पोर्ट्स वीमेंस प्रोग्राम से मिले आर्थिक सहयोग ने भी उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया।

इंटरनेशनल मंच पर पहचान

साल 2022 में रूपा ने पहला इंटरनेशनल मेडल जीता। इसके बाद 2024 में वियतनाम में हुई एशियन ताइक्वांडो पूमसे चैंपियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता, जो इस इवेंट में भारत का पहला मेडल था। इसी प्रदर्शन के दम पर वह एशिया नंबर 1 और वर्ल्ड नंबर 6 खिलाड़ी बनीं।

अब रूपा बेयोर (Rupa Bayor) एशियन गेम्स 2026 की तैयारी में जुटी हैं। वह सिर्फ मेडल जीतने वाली खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि उन हजारों लड़कियों के लिए उम्मीद हैं, जो सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखती हैं। रूपा की कहानी यह सिखाती है कि हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, मेहनत और हौसला इंसान को शिखर तक पहुंचा सकता है।

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Neetish Kumar Mishra Sports Digest Hindi में Editor के रूप में कार्यरत हैं और खेल पत्रकारिता में गहरा अनुभव रखते हैं। क्रिकेट, कबड्डी, टेनिस, फुटबॉल और अन्य खेलों की बारीकियों पर इनकी पकड़ बेहद मजबूत है।

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