Thursday, February 12

भारत में ‘ट्रैक एंड फील्ड की रानी’ के नाम से जाना जाता है और पिलावुल्लाकांडी थेक्केपराम्बिल उषा एक मशहूर भारतीय एथलीट मानी जाती हैं। पीटी उषा का जन्म 27 जून 1964 को पय्योली, केरन में हुआ था। मशहूर होने से पहले भारत की ये स्टार एथलीट ने बेहद गरीबी देखी है। उनके माता-पिता गांव में किसानी करते थे। उषा अपने शुरुआती दिनों से ही मेहनत करने लगी थी। इसी दौरान उन्होंने दौड़ना शुरु कर दिया था।

पीटी उषा की मेहनत से कोच हुए प्रभावित

इसके बाद पीटी उषा के स्कूल में एक टीचर ने उनका परिचय अन्य एथलीटों के साथ करवाया। साल 1977 में उषा को एथलेटिक्स कोच ओ. एम. ने देखा। कोच ओ. एम. ने की नजर जैसे ही एक दुबली-पतली व तेज चलने वाली लड़की पड़ी तो ऐसे में वो काफी प्रभावित हुए। इसके बाद कोच ओ. एम. ने उनको ट्रेनिंग देने के लिए अन्य लोगों के साथ बात की। इसके बाद पीटी उषा ने भी प्रोफिशनल्स के साथ ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। इस दौरान उनके रेस के प्रति मेहनत और लगन को देखते हुए लोगों ने पीटी उषा का नाम ‘पय्योल्ली एक्सप्रेस’ रखा गया। इसका मतलब ‘ट्रैकिंग के फील्ड की रानी’ है।

1979 में बनाया पहला नेशनल रिकॉर्ड

इसके बाद पीटी उषा ने एक रेसर रूप में अपना करियर शुरू किया। बाद में पीटी उषा एक के बाद परेशानियों से पार पा कर करियर की बुलंदियों की ओर पहुंचने लगी। उन्होंने साल 1979 में अपना पहला नेशनल रिकॉर्ड बनाया, जिसने उनके शानदार करियर की शुरुआत हुई। पीटी उषा ने 1982 में नई दिल्ली में एशियाई खेलों में अपनी शुरुआत की, जहां उन्हें दो रजत पदक से सम्मानित किया गया। फिर उन्होंने साल 1984 में लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भाग लिया जहां उसने प्रतिस्पर्धा की। इस दौरान वह सिर्फ तीसरे स्थान पर रह गई। जिसने बाद अपना कांस्य पदक अर्जित किया और फिर 1985 में एशियन ट्रैक एंड फील्ड चैंपियनशिप में, उसने एक ही गेम में पांच स्वर्ण और एक कांस्य जीता। बाद में 1985 में उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 1984 में उन्हें भारतीय एथलेटिक्स में उनके योगदान के लिए अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

PT Usha
फोटो- एक्स (पूर्व में ट्विटर)

पीटी उषा ने कई ऐसे भी कार्य किए हैं जिससे आने वाले प्यूचर एथलीट्स को सही पहचान मिल सके। उन्होंने केरल में एथलेटिक्स के उषा स्कूल की स्थापना की। इसके अलावा उन्होंने एथलीटों को एक ट्रेनर के साथ-साथ एक अभिभावक के रूप में ट्रेनिंग दी। जिसमें उनकी दो बेटियां भी शामिल हैं। उन्हें सर्वश्रेष्ठ भारतीय एथलीट के रूप में भी जाना जाता है। वह एक रिकॉर्ड ब्रेकर एथलीट थीं और दूसरों के लिए लक्ष्य निर्धारित करती थीं।

पीटी उषा ने पहली बार 1980 में मास्को और फिर 1984 (लॉस एंजिल्स), 1988 में सियोल में ओलंपिक में भाग लिया। 1984 में, उषा 400 मीटर दौड़ में चौथे स्थान पर रही, एक सेकंड के सिर्फ 1/100 वें स्थान पर कांस्य पदक से चूक गई। यह उनके करियर का सबसे शानदार प्रदर्शनों में से एक है। इस दौरान एक भी पदक नहीं जीतने के बावजूद, पीटी उषा को अभी भी अब तक के सबसे महान भारतीय एथलीटों में से एक माना जाता है। वह भारतीय महिलाओं के एथलेटिक्स की दुनिया में सबसे टॉप स्थान पर आती हैं। उन्होंने अपने करियर के दौरान पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है।

पीटी उषा की उपलब्धियां

एशियाई चैंपियनशिप:

5 स्वर्ण पदक (1985)
1 कांस्य पदक (1985)

एशियाई ट्रैक और फील्ड मीट:

13 स्वर्ण पदक (1983-1989)

एथलेटिक्स में विश्व चैंपियनशिप:

400 मीटर बाधा दौड़ (1987) के सेमीफाइनल में पहुंचे
राष्ट्रीय रिकॉर्ड:
100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर और 400 मीटर बाधा दौड़ की घटनाओं में राष्ट्रीय रिकॉर्ड के धारक

पुरस्कार और सम्मान:

अर्जुन पुरस्कार (1984)
पद्म श्री (1985)
पद्म भूषण (2000)
इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशन (IAAF) (2019) से वेटरन पिन

पीटी उषा भारतीय इतिहास के सबसे महान एथलीटों में से एक हैं। वह एक दशक से अधिक समय से एशियाई ट्रैक और क्षेत्र की घटनाओं पर हावी रही थीं। पीटी उषा लाखों भारतीयों को अपनी कड़ी मेहनत और समर्पण के लिए प्रेरित किया है।

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साल 2020 से स्पोर्ट्स पत्रकारिता में एक सिपाही के तौर पर कार्यरत हूं। प्रत्येक खेल में उसके सभी पहलुओं के धागे खोलकर आपके सामने रखने की कोशिश करूंगा। विराट व रोहित का बल्ला धोखा दे सकता है, लेकिन आपको यहां खबरों की विश्वसनियता पर कभी धोखा नहीं मिलेगा। बचपन से ही क्रिकेट के साथ-साथ अन्य खेलों में खास दिलचस्पी होने के कारण इसके बारे में लिखना बेहद पसंद है।

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