Paris Olympics: 1900 में पेरिस में हुए ओलंपिक से भारतीय दल खेल महाकुंभ में भाग ले रहा है। आजादी के बाद से भारत 16 ओलंपिक में भाग ले चुका है लेकिन हम अब भी वहां दहाई का आंकड़ा पार नहीं कर पाए हैं। भारत ने पिछली बार टोक्यो ओलंपिक में एक स्वर्ण सहित कुल सात पदक जीतकर खेल महाकुंभ का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। इस बार हम सिर्फ छह पदक ही जीत पाए। हम इस बार एक भी स्वर्ण पदक नहीं जीत पाए।
भारत की तरफ से नीरज चोपड़ा ही सिर्फ एक ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने भारत को रजत पदक दिलाया। दुनिया की पांचवें नंबर की अर्थव्यवस्था और सबसे अधिक जनसंख्या मे होने का दम भरने वाले भारतीय हम सभी को सोचना होगा कि ऐसा क्या है कि हम पदक तालिका में 70वें नंबर पर मौजूद हैं। पड़ोसी पाकिस्तान 100 मेडल जीत कर 62वें नंबर पर है।
पेरिस ओलंपिक (Paris Olympics) मे भारत का प्रदर्शन

भारतीय एथलीटों पर केंद्र सरकार ने करीब 470 करोड रुपए से अधिक का निवेश किया लेकिन 117 एथलीटो के भारतीय दल में केवल मनु भाकर एकमात्र ऐसी एथलीट रही जिन्होंने देश को दो पदक दिलाए। भारतीय पुरुष हॉकी टीम और नीरज ने निरंतरता बरकरार रखते हुए कांस्य पदक और रजत पदक जीता, परंतु सभी दिग्गज फ्रांस की राजधानी में देश की आशाओं को पूरा नहीं कर सके। साल 2008 में बीजिंग के बाद टोक्यो में पहली बार स्वर्ण पदक का दर्शन करने वाले भारतीय एथलीटों के लिए इस बार भी स्वर्ण केवल सपना बनकर रह गया।
इसका प्रमुख कारण है कि साल 2008 से लेकर अब तक केवल कुश्ती को छोड़ दे तो कभी किसी खेल में भारतीय एथलिटो के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं दिखाई दी। पुरुष हॉकी टीम ने लगातार दो ओलंपिक में पदक जीत कर देश का नाम गौरावन्तित की है, परंतु अन्य खेलों में हमें निराशा ही हाथ लगी है। अगर ओलंपिक इतिहास की बात करें तो मेजर ध्यानचंद की हॉकी टीम ने भारतीय की झोली गोल्ड मेडल से भरी।
Paris Olympics: अभी हम बहुत पीछे हैं अन्य देशों के मुकाबले

Paris Olympics: उसके बाद मिल्खा सिंह और पीटी उषा ने दिल अपने खेल से सभी फैंस का दिल जीता, लिएंडर पेस और कारण मल्लेश्वरी ने पदक जीतना सिखाया अभिनव बिंद्रा और नीरज ने अन्य खेलों में भी सोडियम चमक दिखाई लेकिन हम चीन, अमेरिका , ऑस्ट्रेलिया, जापान, ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी जैसे विकसित देश तो छोड़ो, छोटे से देश उज़्बेकिस्तान युद्ध में जस्ट यूक्रेन और गरीबी से परेशान अफ्रीकी देश केन्या तक से इस मामले में हम अभी बहुत पीछे हैं.
ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने कोई कसर छोड़ रखी है। केंद्र सरकार जहां तैयारी पर करोड़ों खर्च रही हैं तो अधिकतर राज्यों ने पदक जीतने की स्थिति में करोड़ों की इनाम राशि के अलावा जमीन और सरकारी नौकरी देने तक का प्रावधान रखा है।
Paris Olympics: आखिर कब तक दिल जीतते रहेंगे
कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियाई गेम्स में पदक जीतने पर भी सम्मान और बड़ी राशि मिलती है केंद्र सरकार ने 13 एथलीटों की ट्रेनिंग पर एक-एक करोड रुपए से ज्यादा खर्च किए गए ट्रेनिंग के लिए मन माफिक विदेशी दौरे कराए गए मनपसंद कोच फिजियोथैरेपी और सपोर्ट स्टाफ भी दिया गया लेकिन नतीजा ढाक के तीन पास।
महिला धुरंधर दीपिका कुमारी एक पदक नहीं जीत सकी है पहलवान विनेश फॉगट 100 ग्राम ज्यादा वजन होने के कारण फाइनेंस से अयोग्य घोषित की गई और 6 एथलीट चौथे स्थान पर रहे कई एथलीट तो ऐसे रहे जैसे पहली बार खेलने उतरे हों। पदक के मुख्य दावेदार लक्ष्य सेन आखिरी समय में भटक गए कब तक हम सिर्फ दिल ही जीते रहेंगे। अगर भारत को 2036 ओलंपिक की मेजबानी करनी है तो उसे दिल जीतने की जगह पदक जीतने वाला देश बना होगा।
पांच दावेदारों पर खर्च हुए थे 20 करोड़

Paris Olympics: पिछली बार टोक्यो ओलंपिक में भारत ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए सात पदक जीते थे और इस बार भारतीय एथलीटों से यह आंकड़ा दहाई में ले जाने की आशा थी। इस बार के ओलंपिक गेम्स मे एथलीटों को तैयार करने में भारत सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी और लगभग 470 करोड़ से अधिक की राशि इसमें झोंक दी। भारत के 117 एथलीटों ने भले ही टूर्नामेंट में भाग लिया हो लेकिन पदक जीतने के पांच दावेदार ऐसे थे जिनकी तैयारी पर करीब 20 करोड रुपए खर्च किए गए थे। इनमें नीरज चोपड़ा को छोड़ दें तो से सभी एथलीट के हाथ ओलंपिक में निराशा ही लगी है।
Paris Olympics: भारतीय एथलीटों के हाथ से फिसले 6 ब्रांज मेडल

पेरिस ओलंपिक (Paris Olympics) में भारत के कुल पदकों की संख्या दहाई में पहुंच सकती थी, परंतु इस बार हमारे 6 एथलीटों के हाथों से ब्रोंज चूक गया और हम अपने विगत प्रदर्शन को भी नहीं दोहरा सके। पेरिस में दो पदक जीतने वाली भारत की पहले एथलीट मनु भाकर के अलावा अर्जुन बबूता और नरूका माहेश्वरी की जोड़ी भी निशानेबाजी की अपनी-अपनी स्पर्धा में कांस्य पदक जीतने से पीछे रह गई।
इनके अलावा बैडमिंटन में लक्ष्य सेन और गत ओलंपिक पदक विजेता भरोतोलक मीराबाई चानू भी इतिहास रचने के करीब पहुंचने पर देश की झोली में पदक नहीं डाल सकी। वही बात करें भारत के धनुर्धारों से तो वह भी हर बार की तरह इस बार भी हमारी लगाए गए आशाओं को निराश करते हुए नजर आए। धीरज-अंकित की जोड़ी सेमीफाइनल में पहुंची तो पदक की आस लगी पर वह भी इस सूखे को समाप्त नहीं कर सके।
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