कई बार क्रिकेट में ऐसा होता है कि कोई खिलाड़ी बहुत अच्छा खेलता है, लेकिन फिर भी उसकी टीम मैच हार जाती है। ऐसे में खिलाड़ी अपने शानदार खेल से तो खुश होता है, लेकिन टीम की हार उसे पूरी तरह संतुष्टि नहीं मिलती टीम की हार के पीछे कई कारण हो सकते हैं जैसे बाकी खिलाड़ियों का अच्छा प्रदर्शन न करना, रणनीति में गलती, या फिर विरोधी टीम का ज़्यादा बेहतर खेलना। ऐसे हालात में उस खिलाड़ी को बस यही सुकून रहता है कि उसने अपना पूरा दम लगाया और लोगों का दिल जीत लिया। अब ऐसे खास खिलाड़ियों की बात करते हैं जिन्होंने कई बार मैन ऑफ़ द मैच का अवॉर्ड तो जीता, लेकिन उनकी टीम उस दिन मैच नहीं जीत सकी। फिर भी उन्होंने अपने खेल से सबको प्रभावित किया।
सचिन तेंदुलकर- 9 बार
सचिन तेंदुलकर, जिन्हें पूरी दुनिया ‘मास्टर ब्लास्टर’ और ‘क्रिकेट का भगवान’ कहती है, वह नाम है जिसने सालों तक भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की उम्मीदों का बोझ अपने कंधों पर उठाया। उन्होंने न जाने कितनी बार अकेले दम पर मैच जिताने की कोशिश की, लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ जब उनका शानदार खेल भी टीम को जीत नहीं दिला सका।

एक दौर था जब भारतीय टीम में न तो मज़बूत फिनिशर थे और न ही मज़बूत मध्यक्रम। उस समय सचिन अकेले ही लड़ते थे। बाद में जब टीम मज़बूत हुई, तब भी उन्होंने कई मौकों पर टीम को संभाला।
2009- ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ, हैदराबाद में वनडे मैच
भारत को जीत के लिए 350 रन चाहिए थे। सचिन ने 175 रनों की ज़बरदस्त पारी खेली और अकेले दम पर मैच पलटने की पूरी कोशिश की। लेकिन जैसे ही वह आउट हुए, बाकी बल्लेबाज़ टिक नहीं पाए। भारत ने आखिरी 3 विकेट जल्दी गंवा दिए और 17 गेंदों में सिर्फ 19 रन नहीं बना पाया। टीम हार गई, लेकिन सचिन की वह पारी आज भी एक यादगार मिसाल है।
1999- चेन्नई टेस्ट, पाकिस्तान के खिलाफ
271 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए, सचिन ने कमर दर्द के बावजूद 136 रन बनाए। उन्होंने मुश्किल हालात में टीम को लड़ने लायक स्थिति में लाकर खड़ा किया। लेकिन उनके आउट होते ही बाकी बल्लेबाज़ बिखर गए और भारत सिर्फ 12 रन से मैच हार गया। मैच हारने के बाद भी पूरे स्टेडियम ने खड़े होकर उनकी पारी को सलाम किया।
ये वे पल थे जब टीम भले हार गई, लेकिन सचिन ने करोड़ों दिल जीत लिए। उनका संघर्ष, जुनून और खेल के प्रति समर्पण ही उन्हें महान बनाता है।
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क्रिस गेल- 6 बार

क्रिस गेल का नाम वेस्ट इंडीज़ के बेहतरीन बल्लेबाज़ों में शुमार है। वह अपने तगड़े छक्कों और तेज़ शॉट्स के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं। वह वेस्ट इंडीज़ के उन कुछ गिने-चुने सितारों में से एक रहे हैं, जिन्होंने टीम के मुश्किल दौर में भी चमक दिखाई।
जब वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट का स्वर्णिम युग (1970–1980 के दशक) बीत चुका था और टीम उतनी मज़बूत नहीं रही, तब भी गेल ने कई मौकों पर अकेले दम पर बेहतरीन पारियाँ खेलीं। लेकिन अक्सर ऐसा हुआ कि उन्होंने टीम को अच्छी शुरुआत दिलाई, फिर भी मध्यक्रम और बाकी खिलाड़ी उसका फायदा नहीं उठा पाए और टीम मैच हार गई।
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अहमदाबाद, 2002- भारत के खिलाफ
गेल ने सिर्फ 127 गेंदों में 140 रन बनाए। इस मैच में वेस्ट इंडीज़ ने 325 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया। लेकिन इसके बावजूद भारत ने यह मुश्किल लक्ष्य हासिल कर लिया। उस दिन भारतीय टीम ने मैच जीत लिया, लेकिन ‘मैन ऑफ़ द मैच’ क्रिस गेल बने।
एंडी फ्लावर- 5 बार
एंडी फ्लावर ज़िम्बाब्वे के महानतम क्रिकेटरों में से एक हैं। वह न सिर्फ एक शानदार बाएं हाथ के बल्लेबाज़ थे, बल्कि एक बेहतरीन विकेटकीपर भी थे। जिस समय ज़िम्बाब्वे की टीम अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में संघर्ष कर रही थी, उस दौर में एंडी फ्लावर अकेले ही उम्मीद की किरण बनकर उभरे।

फ्लावर ने कई खास मौकों पर टीम के लिए मैच जिताऊ पारियाँ खेलीं। अगर वह किसी मज़बूत टीम (जैसे ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या भारत) के लिए खेले होते, तो शायद उन्हें दुनिया के महान बल्लेबाज़ों में गिना जाता।
2001- दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट मैच
पहली पारी में दक्षिण अफ्रीका ने हर्शल गिब्स, गैरी कर्स्टन और जैक्स कैलिस की बड़ी पारियों के दम पर 600 रन बनाए। जवाब में ज़िम्बाब्वे की हालत खराब थी, लेकिन फ्लावर ने 142 रन बनाकर टीम को 286 तक पहुँचाया।
इसके बाद ज़िम्बाब्वे को फॉलो-ऑन खेलना पड़ा। दूसरी पारी में फ्लावर ने शानदार 199* रन बनाए, लेकिन निचले क्रम के बल्लेबाज़ उनका साथ नहीं दे सके।

