जानें कौन हैं वो भारतीय महिला पहलवान, जिन्होंने मेडल के साथ-साथ जीता फैंस का दिल

लेकिन इन सभी पहलवानों ने अपनी लगन और निरंतर कड़ी मेहनत के बल पर अपना सपना तो पूरा किया, बल्कि भारत को इस क्षेत्र में वर्ल्ड लेवल पर अगल ही पहचान दिलाई। इसी कड़ी में आपको मिलाते हैं भारत देश की उन महिला पहलवानों से जिन्होंने देश को वर्ल्ड चैम्पियनशिप में मेडल दिलाया और भारत का नाम रोशन किया। 

कहते हैं यदि इरादे मजबूत हो, हौसले बुलंद हो और खुद पर पूरा विश्वास हो तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको अपना लक्ष्य हासिल करने से नही रोक सकती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया भारत की इन पांच महिला पहलवानों ने इन सभी के लिए कुश्ती का सफ़र बहुत ही मुश्किल भरा था। लेकिन इन सभी पहलवानों ने अपनी लगन और निरंतर कड़ी मेहनत के बल पर अपना सपना तो पूरा किया, बल्कि भारत को इस क्षेत्र में वर्ल्ड लेवल पर अगल ही पहचान दिलाई। इसी कड़ी में आपको मिलाते हैं भारत देश की उन महिला पहलवानों से जिन्होंने देश को वर्ल्ड चैम्पियनशिप में मेडल दिलाया और भारत का नाम रोशन किया। 

अल्का तोमर

मेरठ के सिसौली गाँव में जन्म लेने वाली अल्का तोमर ने उस समय रेसलिंग शुरू की थी, जब उत्तर प्रदेश में लोग कुश्ती को लेकर विरोध करते थे। 1998 में जब अलका ने अपने गाँव सिसौली से निकलकर चौधरी चरण सिंह विश्व विद्यालय के कुश्ती कोच जबर सिंह सोम से कुश्ती की बारीकियां सीखनी शुरू की थी तो ऐसे में गाँव के ज्यादातर लोग इसका विरोध करते थे। लेकिन अल्का ने अपना फोकस अपने काम पर लगातार बनाए रखा और सभी की बातों को अनदेखा कर दिया। सिर्फ ओलंपिक को छोड़ दिया जाये तो अल्का तोमर ने हर बड़ी रेसलिंग चैम्पियनशिप में मेडल जीते हैं और इसके लिए उन्हें अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया। अल्का ने देश के लिए कई सारे मेडल जीते जिसमे वर्ल्ड चैम्पियनशिप का ब्रांज मेडल भी शामिल है। इस मेडल को जीतने के बाद वो देश की पहली महिला बन गई जिन्होंने वर्ल्ड चैम्पियनशिप में मेडल जीता। अलका के पिता को शुरू से ही कुश्ती में काफी दिलचस्पी थी। उन्होंने उन्होंने अपने बेटे में मेडल लेन का सपना देखा था। अल्का के भाई ने कुश्ती भी की लेकिन अपने पिता के सपने को वो उड़ान नही दे पाए जिसका सपना उनके पिता ने देखा था। लेकिन अल्का ने पिता ने हिम्मत नही हारी उन्होंने अल्का को कुश्ती के लिए प्रोत्साहित किया। अल्का जब 10 वर्ष की थी तभी से पिता नैन सिंह तोमर ने अल्का को रेसलिंग के लिए तैयार करना शुरू कर दिया था। उन्होंने अल्का को भी उसी माहौल में पाला जिस माहौल में अपने दोनों बेटों को पाला था। उन्होंने अल्का और दोनों भाइयों में कोई फर्क नही रखा। कुश्ती के लिए उन्होंने अल्का के बालों को एकदम छोटे करवा दिए थे। उसके बाद से ही अल्का ने रेसलिंग की दुनिया में कदम रखा। अल्का तोमर ने सबको हैरानी में तब डाल दिया जब उन्होंने 2006 चीन वर्ल्ड चैम्पियनशिप में वह कर दिखाया जिसे कोई सोच भी नहीं सकता था। विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप के इतिहास में भारत की ओर से 1961 में उदयचंद और 1967 में विसंभर सिंह ने मेडल जीता था। इसके बाद अलका ने 2006 में मेडल जीतकर भारत की पहली महिला पहलवान बन गई। अल्का ने अपने प्रदर्शन से सबको मुहतोड़ जबाब दिया और कुश्ती को लेकर जो भी मिथक लोगों के दिलों में थी सब खत्म कर दिया। अल्का ने एशियन गेम्स, नेशनल चैम्पियनशिप, कामनवेल्थ गेम और तमाम प्रकार की कुश्ती प्रतियोगियों में ढेर सारे मेडल जीते और इसी की बदौलत उन्हें अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया |

गीता फोगाट

कुश्ती के क्षेत्र में गीता फोगाट एक ऐसा नाम है जिसे शायद हर कोई जानता है। गीता का जन्म 15 दिसम्बर 1988 को हरियाणाके छोटे से गाँव बलाली के भिवानी में हुआ था। साल 2010 में दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों में फ्री स्टाइल महिला कुश्ती के 55 kg कैटेगरी में गीता फोगाट ने गोल्ड मेडल अपने नाम करने वाली पहली भारतीय महिला बनी। अगर ठान लो तो कुछ भी करना असम्भव नही है इस बात का उदाहरण गीता ने तब दिया जब उन्होंने 2009 और 2011 के राष्ट्रमंडल कुश्ती चैम्पियनशिप में 55 व 56 किलोग्राम भार के साथ पहलवानी में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया था। उन्होंने साल 2012 विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप के 55 kg वर्ग में कांस्य पदक जीतने के साथ ऐसा करने वाली दूसरी महिला पहलवान बनी। 

बबिता फोगाट

गीता फोगाट की बहन बबिता फोगाट ने देश को कई मेडल दिलाये और देश का नाम गौरवान्वित किया। स्काटलैंड के ग्लास्गो में आयोजित कामनवेल्थ गेम्स 2014 में बबिता ने 55 किलोग्राम भार वर्ग में फ्रीस्टाइल कुश्ती में कनाडा की महिला पहलवान ब्रितानी लाबेरदुरे पहलवान को हराकर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता। इस उपलब्धि के साथ बबिता पूरी दुनिया में फेमस हो गयी। बबिता के नाम 2010 कामनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल, 2012 वर्ल्ड रेसलिंग चैम्पियनशिप और 2013 एशियन रेसलिंग चैम्पियनशिप में ब्रांज मेडल जीता था। वर्ल्ड चैम्पियनशिप का ब्रांज मेडल दोनों बहनों के नाम है। ये दोनों बहनों के उपर बहुत ही मशहूर फ़िल्म दंगल बनाई गयी है। इस मूवी में इन दोनों बहनों के उपर ही कहानी बनाई गयी है।

पूजा ढांडा

पूजा ने अपने करियर की शुरुआत जूडो खिलाड़ी के रूप में शुरू किया था। उन्हें जूडो से बेहद पसंद था जिसे वो बहुत प्यार करती थी। उन्होंने इस खेल में सफल भी रही और देश के लिए तीन अन्तेर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट में मेडल जीते। हांलाकि अपनी तारीफ के बावजूद पूजा ने पूर्व भारतीय पहलवान और कोच कृपाशंकर के साथ बातचीत के बाद जूडो से आगे बढ़ने का निर्णय लिया और कुश्ती के लिए जी जान से जुट गई। पूजा को बहुत जल्द ये अहसास हो गया कि अगर वो इस खेल में मेहनत करेंगी तो सफलता हासिल कर सकती है और इसी सोच और जज्बे के साथ वो निरंतर कासी मेहनत की और उन्होंने आगे चलकर भारत देश का नाम रोशन किया। ढांडा ने 2009 में कुश्ती में कदम रखा और तब से पीछे मुड़कर नही देखा। सिंगापूर में आयोजित यूथ ओलंपिक में 60 किलोग्राम में उन्होंने रजत पदक जीता। 2013 विश्व चैम्पियनशिप में अपनी पहली उपस्थिति दर्ज की। पूजा ने वर्ष 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स व सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैम्पियनशिप में देश का नाम रोशन किया था। 

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